खबर विशेष

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सोमवार 27 अप्रैल 2020 – इंदौर पृष्ठ 1 का शेष


अभिभावकों ने ली राहत की सांस...


भिभावकों ने जो छात्र अध्ययन नहीं कर पा रहे हैं उनकी पढाई की जवाबदारी निजी स्कूलों को निभानी होगी। ऑनलाइन अध्यापन के लिए छात्रों और उनके अभिभावकों पर किसी भी प्रकार से अतिरिक्त फीस के लिए दबाव नहीं बनाया जा सकता है। किताबों को लेकर निजी स्कूलों की नहीं चलेगी मनमानी स्कूल शिक्षा विभाग ने अपने आदेश में कहा है, कि निजी स्कूलों द्वारा अभिभावकों को संबंधित बोर्ड की किताबों के अलावा किसी अन्य किताबों को खरीदने के लिए विवश नहीं किया जाएगा।सरकार ने यह साफ कर दिया है कि छात्रों पर कॉपी, किताब, यूनिफार्म खरीदने आदि को लेकर स्कूलों की मनमानी नहीं चलेगीकुछ निजी स्कूलों द्वारा कमीशन की नियत से किताबों को हर साल बदला जाता है। जिसके कारण छात्रों को नया कोर्स खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। स्कूल नए पाठ्यक्रम के आधार पर ही शिक्षण कार्य संचालित करते हैं। जिस पर लगाम लगाने के लिए शासन ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं की बोर्ड से संबंधित किताबों के अलावा पालकों को नया कोर्स नहीं खरीदना पड़ेगा। नियमित रूप से वेतन देना होगा स्कूल स्टाफ को वेतन देने के नाम पर स्कूल मालिक फीस


वसूलने पर जोर देते हैं। ज्यादातर ऐसी मांगे लाखों करोड़ों रुपए बैंक बैलेंस रखने वाले स्कूलों की तरफ से आती हैं। सरकार को स्कूलों के बैंक खाते जांचने चाहिए साथ ही हर साल स्कूलों का ऑडिट भी होना चाहिए जिसमें कुल प्राप्ति और कुल व्यय का स्पष्ट उल्लेख होराज्य सरकार ने निजी स्कूलों को अपने यहां काम करने वाले सभी शैक्षणिक और गैरशैक्षणिक स्टाफ को नियमित रूप से वेतन भुगतान के आदेश दिए हैं। निर्देशों का पालन नहीं करने पर संबंधित स्कूल संचालकों के खिलाफ मान्यता नियमों के तहत कार्रवाई की जाएगीयह निर्देश सीबीएसई, आईसीएससी, माध्यमिक शिक्षा मंडल के साथ अन्य सभी बोर्ड से मान्यता प्राप्त स्कूलों पर लागू होंगे।


संभाग के समस्त जिला शिक्षा अधिकारी व जिला परियोजना समन्वयकों को निर्देश दिए गए हैं, कि शासन द्वारा जारी फीस संबंधी सभी निर्देशों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित किया जाएं। शिकायत प्राप्त होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जावेगी। उन्होंने कहा कि पालकों को चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। संयुक्त संचालक, मनीष वर्मा


 


ना हो अज्ञात भय से ग्रस्त


अदृश्य शत्रु से लड़ाई में, सभी महाशक्तियां हुई पस्त। सजग होकर हम भी लड़ें, न हों अज्ञात भय से ग्रस्त।। सोचो, श्रीराम ने क्यों छिपकर, दूर से किया था, बाली का संहारसम्मुख शत्रु की शक्ति हरकर, छल से पाया था जीत का उपहारअदृश्य शत्रु भी प्रवेश करके, रग में करता प्रतिरोधक क्षमता ध्वस्त।। सजग होकर हम भी लड़ें, ना हो अज्ञात भय से ग्रस्त.... देखो, कितने योद्धा दिन-रात जटे, बने मानवता के रक्षक। पुलिस कर्मी, सफाई कर्मी, शिक्षक, नर्स और चिकित्सकसंक्रमण के खतरे भेद रहे, कर रहे बीमारों को स्वस्थ।सजग होकर हम भी लड़े, ना हो अज्ञात भय से ग्रस्त... समझो, सांप के काटे से कम, भय से मौत हुई ज्यादा। आत्मघात से बचे हम, आतंक के खौफ कहाँ हो सफाया। निडरता से हम भी बढ़ें, दूर से शत्रु को करें परास्त।सजग होकर हम भी लड़े, न हो अज्ञात भय से ग्रस्त.... समय का सदुपयोग करें हम, नकारात्मक विचारों को त्यागे। आजादी का दुरुपयोग रोंकें हम, सकारात्मक संदेशों को फैलाएंसंक्रमण की श्रृंखला हम तोड़े, शत्रु का आमंत्रण करें निरस्त।। सजग होकर हम भी लड़े, न हों अज्ञात भय से ग्रस्त..... संयुक्त संचालक, मनीष वर्मा जी


 


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डब्ल्यूएचओ अपनी जिम्मेदारी में कहां चूका? पृष्ठ 1 का शेष


अपनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करने के आरोप है। अमेरिका की नाराजगी इस बात पर आधारित है , की डब्ल्यूएचओ ने कोरोना संक्रमण को लेकर सही जानकारी दुनिया के सामने नहीं रखी।अमेरिकी राष्ट्रपति की चीन से होने वाली यात्राओं पर रोक लगाने की बात पर भी डब्ल्यूएचओ ने अपना विरोध जताया थादुनिया की रिसर्च आने से पहले ही डब्ल्यूएचओ ने कोरोनावायरस को लेकर कह दिया कि यह बीमारी इंसान से इंसानों में नहीं फैलती जिससे लोग निश्चिंत हो गए और वायरस को दुनिया के हर कोने तक पहंचने का मौका मिला। एक जिम्मदार स्वास्थ्य संगठन स यह उम्मीद नहीं की जा सकती, कि वह किसी बीमारी के बारे में गलत जानकारी देगा। संभवत विश्व स्वास्थ्य संगठन उस समय तक कोरोनावायरस के बारे में अधिक जानकारी हासिल ना कर पाया होतो फिर उसे यह बयान देने की आवश्यकता ही क्या थी। चीन के वुहान शहर से कोविड-19 संक्रमण के फैलने की खबर आते ही दुनिया के देशों ने चीन से होने वाली यात्राओं पर प्रतिबंध लगाने की तैयारियां शुरू कर दी। तब डब्ल्यूएचओ ने यात्रा प्रतिबंध का विरोध किया और सीमा खुली रखने की वकालत की। नतीजतन यूरोपियन देशों की सीमाएं खली रही और वायरस को पूरे यूरोप में फैलने का मौका मिला। इटली के हालत बिगड़ने का मुख्य कारण सीधे तौर पर उसका चीन से हवाई यात्रा जारी रखना था। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चीन के प्रयासों पर भरोसा दिखाया कि वह वायरस नियंत्रण पर सही काम कर रहा है। डब्ल्यूएचओ के दिशा निर्देशों की अवहेलना करने वाले देशों में करोना संक्रमण के फैलाव में कमी देखने को मिली है। सिंगापुर और जापान के साथ भारत भी इसका एक मजबूत उदाहरण है। इन देशों ने कोरोनावायरस संक्रमण को फैलने से रोकने में काफी हद तक कामयाबी हासिल की है। विश्व स्वास्थ संगठन को पैसा कहां से मिलता है? टल्ल्याचओ की शरुआत 1948 में हई। इसका मुख्यालय स्विटजरलैंड के जेनेवा शहर में स्थित है। संस्था को दो तरह से धन मिलता है। पहला. संस्था के सदस्य देशों से मिलने वाली धनराशि, जो सदस्य बनने के लिए चकानी पड़ती है। इसे असेस्ड कॉन्टरीब्यशन कहते हैं। यह रकम सदस्य देश की आबादी और उसकी विकास दर पर निर्भर करती हैदूसरा, वॉलंटरी कॉन्टरीब्यूशन यानी चंदे की राशि के रूप में संस्था को धनराशि प्राप्त होती है। यह धन सरकारें भी देती हैं, और चैरिटी संस्थान भी। राशि किसी न किसी प्रोजेक्ट के लिए दी जाती हैबजट हर दो साल पर निर्धारित किया जाता है। 2020 और 2021 का बजट 4.8 अरब डॉलर हैपिछले सालों में चीन का योगदान 52 फीसदी तक बढ़ गया हैअब वह 8.6 करोड़ डॉलर दे रहा है। वैसे तो बडी आबादी के कारण चीन का असेस्ड कॉन्टरीब्यूशन भी ज्यादा है लेकिन उसने वॉलंटरी कॉन्ट्रीब्यूशन भी बढ़ाया हैहालांकि अमेरिका के सामने चीन का योगदान कुछ भी नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन को मिलने वाले कल पैसे का अकेले 15 फीसदी पैसा अमेरिका अकेले ही देता है संस्था को सदस्य देश जो पैसे देते हैं, उसका करीब 31 फीसदी हिस्सा अकेले अमेरिका देता है।2018-19 में अमेरिका ने कुल 89.3 करोड़ डॉलर डब्ल्यू एचओ को दिए। दुनियाभर से आए वॉलंट्री कॉन्ट्रीब्यूशन का 14.6 फीसदी अमेरिका से ही आता है। दूसरे नंबर पर कुल 43.5 करोड़ डॉलर के साथ ब्रिटेन सहयोग कर रहा है। इसके बाद जर्मनी और जापान का नंबर आता ह डब्ल्यूएचओ पर चीन का प्रभाव दनिया के 194 देश विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य हैं। ताईवान इसका हिस्सा नहीं है। जानकार इसे भी चीन के प्रभाव का ही असर बताते हैं। 1971 में संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनने के बाद से ही चीन, ताईवान को अंतरराष्ट्रीय संगठनों का सदस्य बनने से रोकता रहा है। चीन यह दावा करता है कि ताईवान उसी का हिस्सा है और इसलिए उसे अलग से सदस्य बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। कई राजनीतिक जानकारों का मानना है,की डब्ल्यूएचओ को शायद डर था, कि अगर वह चीन को किसी भी रूप में चुनौती देता है, तो चीन की प्रतिक्रिया संकट को और बढ़ा सकती है। चीन जिस गति से आर्थिक विकास कर रहा है, डब्ल्यूएचओ के लिए उसे अपने पक्ष में रखना संभवत _ बहुत जरूरी है। जनवरी के अंत में डब्ल्यूएचओ के महानिदेशक टेड्रोस एधानोम घेब्रेयसस ने बीजिंग में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात की और संक्रमण को रोकने के लिए चीन के प्रयासों की सराहना की।सबसे पहले 31 दिसंबर को चीन ने विश्व स्वास्थ्य संगठन को वुहान में न्यूमोनिया जैसी किसी बीमारी के पाए जाने की जानकारी दी। देखते ही देखते यह चीन से दूसरे देशों में फैलने लगी और परिस्थितियों को देखते हुए एक माह के भीतर यानी 30 जनवरी 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे विश्व के लिए एक महामारी घोषित कर दिया। भारत को लेकर विश्व स्वास्थ संगठन कोविड-19 के खिलाफ जंग में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना की पूरी दुनिया तारीफ कर रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन () ने भारत में लॉकडाउन की अवधि बढ़ाने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्णय का प्रशसा करत हुए कहा हाक भारत की यह पहल कोरोना को परास्त करने के लिए समय से उठाए गए कठोर कदम का परिचायक है। आज विश्व स्वास्थ संगठन के महत्व को नकारा नहीं जा सकता, संगठन के ऊपर कोविड-19 के संक्रमण से निपटने की बड़ी जिम्मेदारी है।अमेरिका की कड़ी आलोचना और धनराशि रोके जाने के बावजूद इस महामारी में फ्रांस और जर्मनी ने डब्ल्यूएचओ का समर्थन किया है। वे कहते हैं कि कोरोना महामारी से निपटने के लिए संगठन को अहम भूमिका निभानी होगी। डब्ल्यूएचओ के मखिया टेडोस ने अमेरिका से आरोप-प्रत्यारोप के खेल में लिप्त होने के बजाय चीन के साथ मिलकर बीमारी का मुकाबला करने का निवेदन किया। उन्होंने कहा, यदि आप और लाशें नहीं देखना चाहते हैं, तो आप इसका राजनीतिकरण न करें। यह आग से खेलने जैसा है